मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

तो खुद को पाती हूं ठगा हुआ

क्यूं परिपक्वता को बचपन की दहलीज पर कदम रखने से रोका मैंने?

क्यूं दी जीवन की आहूति किसी गैर के आशियाने में ?

आज वो नहीं आया अपनी खुशियों में बुलाने मुझे

बस छोड़ गया ठगा हुआ मुझे मेरे अश्कों के साथ

खोखले आशियाने में

देखती हूं किसी की डोली उठते तो अहसास होता है उसकी बेबसी का

छोड़ जाएगा वो भी एक दिन किसी वीराने में

तपस्या थी लगन थी पर नहीं था तो सिर्फ साहस,

गैरो को क्या कहें अपनों ने दी समाज की दुहाई

और विदा कर दिया किसी बेगाने के साथ