मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

तो खुद को पाती हूं ठगा हुआ

क्यूं परिपक्वता को बचपन की दहलीज पर कदम रखने से रोका मैंने?

क्यूं दी जीवन की आहूति किसी गैर के आशियाने में ?

आज वो नहीं आया अपनी खुशियों में बुलाने मुझे

बस छोड़ गया ठगा हुआ मुझे मेरे अश्कों के साथ

खोखले आशियाने में

देखती हूं किसी की डोली उठते तो अहसास होता है उसकी बेबसी का

छोड़ जाएगा वो भी एक दिन किसी वीराने में

तपस्या थी लगन थी पर नहीं था तो सिर्फ साहस,

गैरो को क्या कहें अपनों ने दी समाज की दुहाई

और विदा कर दिया किसी बेगाने के साथ

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

क्या यही है बिहार का आइना ?

जवाब दो बिहार
कहां है खामिया सोच में या फिर परंपराओं में, क्यों बनी है ऐसी तस्वीर तुम्हारी पूरा देश पूछता है सवाल क्यों बिहारी घरेलू हिंसा में सबसे आगे.....
घरेलू हिंसा में सबसे आगे हैं बिहारी वो रिक्शा चालक हो या कोई ऊंची पोस्ट पर बैठा अधिकारी या फिर हो कोई नेता और अभिनेता लेकिन बिहार का नाम आते ही चहक उठता है। शायद हर जगह उनकी मौजूदगी ही कराती है उनकी सफलता का एहसाह।

लेकिन देश का एक अहम हिस्सा कहे जाने वाले बिहार की असल में तस्वीर क्या है यह तो शायद वहां कि महिलाएं ही बेहतर बयान कर सकती हैं। आज देश में सबसे ज्यादा अगर किसी राज्य के लोग रोजी रोटी की तलाश में अपना घर बार छोड़कर बाहर निकलते हैं तो वह राज्य है बिहार। लेकिन गरीबी का दर्द झेल रहे बिहार की महिलाओं से अगर पूछा जाए कि वो अपने आपको घर की चारदीवारी में कितना सुरक्षित महसूस करती हैं तो शायद यह तस्वीर और साफ हो जाएगी। विवाहित महिलाओं के साथ पारिवारिक हिंसा, शारीरिक या यौन उत्पीड़न की सबसे अधिक घटनाएं आज भी बिहार में होती हैं जबकि हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा सबसे कम है। यह बात हम नहीं कहते बल्कि इसका प्रमाण केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय दे रहा। मंत्रालय द्वारा वर्ष 2005-06 में कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण एनएफएचएस की जारी रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। एनएफएचएस के संयोजक एवं जनसंख्या विज्ञान अंतरराष्ट्रीय संस्थान के प्रो सुलभ परासुरामन ने रिपोर्ट जारी करने के बाद बताया कि वर्ष 2005-06 में 15 से 49 आयु वर्ग की 4540 महिलाओं और 15 से 54आयु वर्ग के 1592 पुरुषों से पूछताछ के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। उन्होंने बताया कि बिहार में 59 प्रतिशत विवाहित महिलाएं शारीरिक या यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह दर 46 प्रतिशत है। उड़ीसा में प्रत्येक दस विवाहित महिलाओं में से कम से कम चार इनसे पीडि़त है और हिमाचल प्रदेश में मात्र छह प्रतिशत महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की घटनायें हुई है।

दिल्ली हो या मुंबई या फिर हो क्यों न कोलकाता वहां प्रवासी हर दूसरा इंसान रखता है कहीं न कहीं बिहार से ताल्लुक और जुड़ी हैं उसकी बिहार से यादें। पूरे देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पलायन करने वालों में बिहारी सबसे आगे हैं। शायद उनमें तरक्की करने की लालसा ही उन्हें परदेश खींचकर लाती है। ऐसे में तस्वीर बिल्कुल साफ है की उनकी सोच बहुत अच्छी है फिर भी बिहार की जड़ो को दीमक की तरह धीरे-धीरे खोखला करती वहां की घरेलू हिंसा की वारदातें आज भी जस की तस बनी हुई हैं। क्यूं नहीं घट रहें यह आंकड़े कौन देगा इसका जवाब कौन है इसका जिम्मेदार, कहां है खामिया जानना चाहते हैं हम सभी जवाब दो बिहार.....
माफ कीजिए मेरा इरादा किसी समुदाए विशेष को टारगेट करना नहीं बल्कि दिनोंदिन विकास की आंधी में पीछे छूटती जा रह गई कुरीतियों को कुरेदना है जो हमारे जहन में होकर भी नहीं होती या उस विषय पर हम सोचना ही नहीं चाहते। मैं जानना चाहती हूं कि क्या यह आइना हमारी रुढ़ीवादी मानसिकता का है या फिर इसके पीछे छिपी है हमारी पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही परंपराएं कहाँ है खामिया

रविवार, 19 अक्टूबर 2008

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

वो मासूम

कहां से शुरू करूं कब से.....
ट्रेन का लंबा सफर और वो बिल्कुल अकेली बैठी खिड़कियों से बाहर टकटकी लगाए उन तेजी से पीछे भागते पेड़ों को निहारे जा रही थी। शायद वो उन्हें देखकर भी नहीं देख पा रही थी, क्योंकि वो वहां मौजूद जरूर थी पर वहां थी नहीं। जैसे मानो सब कुछ तो वहीं ठहरा है बस बदली है तो चंद समय की घडि़यां, जब वो चली तो तीन साल पहले का समय था और आज तीन साल गुजर चुके फिर भी सब कुछ ज्यों का त्यों ही है। अचानक उसे वो गुजरे अनगिनत लम्हें याद आने लगे जिसमें खुशी से ज्यादा थी गमों की रेखाएं।

जून 2005 शामली के बीकाम का रिजल्ट आ चुका था और घर में सभी लोग काफी खुश थे। उसने अच्छे अंको से परीक्षा जो उत्तीर्ण की थी। मम्मी पापा और अपने पूरे परिवार की लाडली शामली दिनभर घर में इधर से उधर उछलती कूदती रहती कभी भैया से नोकझोंक तो कभी भाभी से इठलाती और कभी अपने प्यारे-प्यारे भतीजे को खिलाती। घर में इतनी लाडली थी कि कोई कभी कुछ कहता ही नहीं था। पापा ने भी एकबार भी नहीं पूछा कि बेटा तुम एमकाम क्यूं नहीं करना चाहती? शायद यह उनके स्वभाव में ही शामिल नहीं था बच्चे जो करना चाहे करें बस उन्हें पैसे देने से मतलब होता था। एमकाम के फार्म की अंतिम तारिख भी गुजर गई और पापा ने एक बार फिर भी नहीं पूछा। पर वो जानती थी कि पापा के मन में कुछ और है।
उसके सपनों की उड़ान अभी बाकि थी। और कुछ ही समय घर में अभी बीते होंगे कि रिश्तेदार और पड़ोसियों की आंखों में जैसे शामिली किरकिरी की तरह चुभने लगी। कब कर रहें हैं शादी कोई लड़का देखा कि नहीं। आखिर आपको कैसे लड़के की तलाश है। कब करेंगे शादी न जाने कितने सवाल पर मेरी मम्मी और पापा का एक जवाब हमें अपनी बेटी को किसी की दासी बनाकर नहीं बिदा करना हम जब तक उसे अपने पैरों पर न खड़ा कर ले नहीं बिदा करना। सौ सवाल के एक जवाब ने कर दिया सभी को खामोश। आखिर हो भी क्यों ने शामिली की दो बहनों के साथ जैसा हुआ सभी वाकिफ थे। बड़ी दीदी एक घरेलू महिला थीं जिन्हें उनके ससुराल वालों ने कितने दुख दिए, शायद वो दर्द इतने थे कि कोई भी लड़की शादी के नाम पर नफरत करने लगती और कुछ ऐसा ही हुआ शामिली के साथ भी और वो भी शादी जैसे पवित्र बंधन से नफरत करने लगी उसे लगता था कि जहां प्रेम न हो ऐसी शादी का क्या अर्थ और क्या मायने जिसके लिए अपना घर परिवार सबकुछ छोड़कर एक लड़की जाती है वो ही उसे वो मान सम्मान प्रेम और अधिकार की बजाय उसपर कहर बरसाए तो आखिर वो कहां जाए। मां बाप की भी मजबूरी कि लड़की पराया धन है उसे जब शादी के पहले नहीं रख सकते तो फिर शादी के बाद रखना तो जैसे समाज के नियम कानूनों को तोड़ना जितना अक्षम्य अपराध ही होगा। फिर भी दी ने किसी तरह नौ महीने अपनी मासूम सी अपनी बेटी के साथ गुजारे। हर पल तिल-तिल जलती और मरती रही वो और समाज था कि ताने पर ताने कसता रहा। वो इंसान कैसा था जो अपनी मासूम सी फूल सी बेटी को एक झलक देखने के बाद दोबारा कभी नहीं आया। कितना भी कोई बेरहम हो पर इतना नहीं हो सकता, जिस फूल को देखकर पत्थर भी पिघल जाता पर ये दहेज का भूखा इंसान नहीं पिघल रहा था। पर शायद उसमें इंसानियत ही नहीं थी.....दिल पर गहरी चोट दे गया था वो हादसा जो कभी न भरे शायद ऐसे जख्म थे।....और फिर शामिली के दिल में भी आत्मनिर्भर बनने की महत्वाकांक्षा हिलोरे मार रही थी। उस पर से मम्मी पापा का पूरा-पूरा सहयोग मिला। पापा मैं अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हूं मैं अपने जीवन में किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती। शादी तो जिंदगी का अंत है पर मैं जिंदगी की शुरूआत करना चाहती हूं, मैं ऐसे क्षेत्र में जाना चाहती हूं जहां मैं किसे के दर्द को बांट सकूं लोगों तक उसकी दर्द भरी आह को पहुंचा सकूं। शायद जिंदगी में अब तक जो देखा वो काफी है फिर कभी किसी के साथ कोई अन्याय न हो। कुछ ऐसे ही सपने थे शामिली के जो उसे जिंदगी में कुछ करने को हर पल मजबूर करते थे। लेकिन इसके लिए अपनों से दूर जाना होगा। मुश्किल था शामिली के लिए अपने परिवार से दूर रहना वह एक दिन भी मम्मी के बिना नहीं रह पाती थी। रिश्तेदारों ने तो टकटकी लगाई थी कि कैसे रहेगी शामिली घर से दूर। आखिर उसके सपनों के आगे परिवार का प्रेम छोटा पड़ गया और निकल पड़ी वो घर से कुछ करने की लालसा में.... आसान न थी डगर पर फिर भी था चलने का हौसला और जिंदगी में कुछ करने की ख्वाइश। हर पल जिंदगी कुछ नए ताने बाने बुनती और कहती कि कुछ कर गुजरना है। इस बीच भी लोगों के खोखले सवाल उसका पीछा ही करते थे। कभी दबी जुबान में बाहर भी आ जाते लेकिन अभी उसे पता था कि उसका लक्ष्य उसके सामने है उसे कुछ ऐसा करना है जो दुनिया की भीड़ से उसे अलग कर दे। देखते देखते एक और साल गुजरा और दिल्ली में उसकी पढ़ाई भी खत्म हो गई। फिर उठे वही सवाल अब नहीं करवानी नौकरी कर दो इसकी शादी नहीं तो भेज दो वापस घर। अब तो अति हो गई जब मेरे घर वालों को मेरी नौकरी से परहेज नहीं तो गैरो को क्यूं हो भला। आंशू के साथ जिंदगी ने फिर चुना एक पथरीला रास्ता छोड़ दिया सब कुछ और निकल पड़ी अपनों से बहुत दूर किसी दूसरे प्रांत में जहां कोई उससे ऐसे बेतुके सवाल न करें और न मांगे उससे भविष्य का हिसाब। अब वो पहले से बहुत खुश और सकून भरी जिंदगी जी रही थी क्योंकि अब उसकी जिंदगी का वो सपना साकार हो चुका था और मम्मी पापा की भी तपस्या रंग लाई थी। धीरे-धीरे एक साल गुजर गया पता ही नहीं चला जैसे पर अब इस समाज में भी जहां वो रह रही थी लोगों को वही सारी समस्याएं दिखने लगी। समाज की अपेछाएं वक्त के साथ बढ़ने लगी, लेकिन उसके दिलों के जख्म को देखने और समझने वाला कोई नहीं था। क्यूं होती है उसे इस समाज के नुमाइंदों से नफरत शायद अब तक तो वो भी उन्हें भुला ही चुकी थी। पर वक्त और लोगों के व्यवहारों ने फिर उसे कुरेदना शुरू कर दिया था। एक बार फिर उसे याद दिला दी कि कैसे जिए वो। आखिर कैसे बीते थे ये दो साल? अक्सर याद आती थी उस बचपन की जहां कुछ कहने से पहले ही सबकुछ मिल जाता। घर का लाड प्यार सबकुछ पर फिर सपने सब भुला देते हैं। कहीं रहने के लिए वहां दिल का लगना बहुत जरूरी है, और शायद वहां बने मित्रों के साथ दिल भी लग गया था। अचानक फिर ली जिंदगी ने एक नई करवट और एक ही दिन में उस ट्रेन के सफर की तरह उसकी जिंदगी ने रास्ता बदल दिया और छूट गए वो सारे पुराने साथी जिसकी मंजिल जहां आई वो वहीं उतर गया। शामिली का मन अब उदास सा रहना लगा, फिर नए लोग और नई दुनिया लेकिन समझने वाला कोई नहीं। धीरे-धीरे उसकी दुनिया का सामना करने की ताकत भी खत्म होने लगी। कैसे कहे वो कि आज उसे वो गुजरे जमाने याद आने लगे, जिन सपनों के लिए उसने सबकुछ छोड़ा था वो भी अब उसे पराए से लगने लगे। डूब सी गई वो अपनी पुरानी यादों में साहस था कि मधम पड़ने लगा। वो शादी नहीं करना चाहती थी पर समाज और रिश्तेदारों की जोर जर्बदस्ती उसे कमजोर कर रही थी। जिंदगी फिर एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर चुकी थी जो उसे परेशान कर रही थी। शेष आगे .....