मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

तो खुद को पाती हूं ठगा हुआ

क्यूं परिपक्वता को बचपन की दहलीज पर कदम रखने से रोका मैंने?

क्यूं दी जीवन की आहूति किसी गैर के आशियाने में ?

आज वो नहीं आया अपनी खुशियों में बुलाने मुझे

बस छोड़ गया ठगा हुआ मुझे मेरे अश्कों के साथ

खोखले आशियाने में

देखती हूं किसी की डोली उठते तो अहसास होता है उसकी बेबसी का

छोड़ जाएगा वो भी एक दिन किसी वीराने में

तपस्या थी लगन थी पर नहीं था तो सिर्फ साहस,

गैरो को क्या कहें अपनों ने दी समाज की दुहाई

और विदा कर दिया किसी बेगाने के साथ

4 टिप्‍पणियां:

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

देखती हूं किसी की डोली उठते तो अहसास होता है उसकी बेबसी का

छोड़ जाएगा वो भी एक दिन किसी वीराने में

तपस्या थी लगन थी पर नहीं था तो सिर्फ साहस,

गैरो को क्या कहें अपनों ने दी समाज की दुहाई

और विदा कर दिया किसी बेगाने के साथ
bahut sunder....badhaaee

Unknown ने कहा…

भाव बहुत ही सुन्दर लगे। शुभवर्तमान

vedvyathit ने कहा…

ye to sch ki reet rhi hai
sch ka gla dbana
ravn kns dusashn jaiso ko
sir pr baithana
sty chahta shkti
shkti ke snchy me jut jana
dr.vedvyathit@gmail.com

keshav ने कहा…

nice